आधार स्तम्भ - स्व. कृष्णपाल सिंह

 
    नाम -  श्री कृष्णपाल सिंह
    पिता -  स्व. श्री त्रिभुवन सिंह
    मात -  स्व. श्रीमती शिवकुमारी सिंह
    राजपूत बैस -  त्रिलोक चंदी बैस
    पता ग्राम    मतई
    तहः -  हुसैन गंज
    जिला -  फ़तेह्पुर, (उ.प्र.)
    जन्म -  28 / 09 / 1938
    निधन -  11 / 4 / 2000 ( चैत्र अष्टमी )
अन्य - विवरण
 
  • जन सामान्य कृषक परिवार में हुआ।
  • परिवार में तीन - भाई एवं तीन बहनों में पांचवां स्थान था।
  • शिक्षा - ग्राम मतई में ही आठवी कक्षा उत्तीर्ण।
  • व्यवसाय - सन 1956 से सन 1996 तक, भिलाई इस्पात संयंत्र में, 40 वर्ष तक कार्यरत ।
  • परिवार के अन्य सदस्य - पत्नी - श्रीमती दम्यन्ती सिंह
  • दो पुत्र - (1) तेज प्रताप सिंह (2) प्रवीण प्रताप सिंह
  • एक पुत्री - श्रीमती चित्र लेखा सिंह

( एक संस्मरण )

मैं कृतार्थ हूं अध्यक्ष का जिन्होने जिन्होने मुझे ऐसे व्यक्ति के संस्मरण लिखने के लिये कहा जिनका अतुलनीय योगदान क्षत्रिय कल्याण सभा को जीवन पर्यन्त मिलता रहा। परम आदरणीय कृष्णपाल सिंह जी, उत्तर प्रदेश के फ़तेहपुर जिला के हुसैनगंज तहसील के ग्राम मतई निवासी बाबू त्रिभुवन सिंह जी, त्रिलोकचंदी बैस परिवार के तीन पुत्र व तीन पुत्रियों में पांचवे स्थान में जन्म लेने वाले "किशन" बचपन से ही बहुत संकोची और शर्मीले स्वभाव के थे।

भिलाई इस्पात संयंत्र मे लगभग 40 वर्षों की उत्कृष्ठ सेवायें देने के उपरांत वर्ष 1996 में वे सेवा निवृत्त हो गये। श्री मती दम्यन्ती  ने जिन्दग?ई के हर अच्छे बुरे वक्त में उनका कंधे से कंधा मिलाकर साथ दिया और अब अपने दोनो पुत्रों तेज प्रताप सिंह तथा प्रवीण प्रताप सिंह के साथ पुत्री श्रीमती चित्र लेखा सिंह की पह्त प्रदर्शिका हैं।

क्षत्रिय कल्याण सभा के द्वारा गत वर्ष मरणोपरान्त सम्मानित किये जा चुके भाई कृष्णपाल सिंह, नवयुवकों के चाचा जी तथा घर-घर के बच्चों और स्त्रियों में लोकप्रिय झोलेवाले अंकल - भाई साहब, उनकी पहचान थी। समाज का शायद कोई भी ऐसा सदस्य हो जिसके घर वे नहीं गये हों या जो उन्हे न पहचानते हों। वे वास्तव में जड से जुडे कार्यकर्ता थे। जो कार्य किसी से न होने वाला हो, वह उन्हें सौंपकर आप निश्चिंत सो सकते थे, फ़िर चाहे चौकीदार का क्यों न रहा हो। जब यह "महाराणा प्रताप भवन" बन रहा था, कालम के लिये लोहा गिराया गया, शेड नही था, तब कोई और व्यवस्था नहीं होने तक वे वहीं सोते थे। आवश्यकता पडने पर सायकल से सीमेंट बोरी लाते थे परन्तु कार्य को अवरुद्ध नही होने देते थे। इनकी इसी जुझारु प्रवृत्ति तथा अदम्य साहस, उत्साह से हम सभी उन्हे "हनुमान जी" कहा करते थे। परमात्मा ने उन्हे कद काठी तो अच्छीदी ्ही थी साथ में कोमल हृदय भी दिया था। महाराणा प्रताप नगर में रहने वाले किसी व्यक्ति के यहां चुल्हा नहीं जला या पानी नहीं मिला, इसकी भी उन्हे सदैव चिन्ता रहती थी और यथा संभव मदद किया करते थे।समाज में किसी के घर भले ही खुशी के अवसर में न गये हो, परन्तु-गमी - दुखी में चार कंधों में से एक कंधा उनका हमेशा ही रहा। उनके रहते हुए समाज के किसी भी कार्यक्रम में "आन्तरिक व्यवस्था" की सारी जिम्मेदारी उनके कंधों में डालकर सभी निश्चिंत हो जाते थे, और वे बखूबी उसे पूरा करते तथा कभी भी "मैं" की बजाय "हम" पर ही विश्वास करते थे। समाज के किसी भी कार्यक्रम में चाहे रायपुर, भोपाल, मकराना कहीं भी जाना हो तो एक कृष्णपाल सिंह सदैव उपलब्ध रहते थे। ऐसा व्यक्ति जो बिना किसी पद प्राप्ति की लालसा से समाज के उत्थान के कार्य में सदैव तत्पर रहा हो, क्या पुन: मिल पाएगा ? अध्यक्ष, पदाधिकारी आदि-आदि तो मिल जायेंगे परन्तु जमीन से जुडा हुआ ऐसा कर्मठ व्यक्ति शायद ही, जाते - जाते ( 10 अप्रेल 2000) अपने मन की अभिलाषा स्वरुप - मां जगदम्बिका की प्राणप्रतिष्ठा (6 अप्रेल से 9  अप्रेल 2000 ) कराकर उनके हाथों में समाज को संगठित और उन्नसित करने का भार सौंपकर चले गये। उनसे संबंधित एक संस्मरण हमारे एक अभूतपूर्व अध्यक्ष ने उस वक्त लगभग - 16 लाख के खर्च पर 44 लाख रुपये के "गबन" की नामजद रिपोर्ट "पांच" व्यक्तियों के नाम करवाईथी, समाचार पत्रों में बहुत कुछ प्रकाशित करवाया गया तथा शासन से आग्रह किया कि महाराणा प्रताप भवन को राजसात कर लिया जाय आदि-आदि। जिनकी जिन्दगी में कभी इस तरह की घटना न घटी हो उन्हे तो सम्मन से ही घबराहट हो जाती है, परन्तु अध्यक्ष राणा प्रताप सिंह जी (बाबू जी) के कारण धैर्य बना रहा। इतना सब कुछ होने के बाद ज्ब उस व्यक्ति की आजीवन सदस्यता खत्म करने की बात उठाई गई तब भाई कृष्णपाल सिंह जी ने इसका विरोध किया, तब ऐसा लगा कि यह व्यक्ति किस मिट्टी का बना है, जो आय दान दे रहा है। क्षत्रिय धर्म का पालन करते -करते  पृथ्वीराज चौहान ने अपनी मौत स्वयं बुलाई थी, परन्तु "वयम रक्षामः" को नही छोडा और बडी से बडी गलती को अभयदान देकर "क्षत्रिय धर्म" की रक्षा की, आखिर ह्मारी धमनियों में वही लहु है, जिसका हमें गर्व है।

शायद यही गुण हमारे समाज की एक जुटता को बनाये रखा है वरना भारत वर्ष में हमारी क्षत्रिय कल्याण सभा के समकक्ष क्षत्रियों का कोई संगठन नहीं होता क्या ?

आखिर कुछ तो है उन 36 खम्भों वाले मजबूत भवन में जो हमें हमारे क्षत्रिय होने का गौरव प्रदान करते हैं, ऐसे ही आधार स्तम्भ भी कृष्णपाल सिंह को शत-शत नमन और उनके परिवार के लिए अनेकों शुभकामनायें।