स्व. श्री शिव भीष्म सिंह

स्व. श्री शिव भीष्म सिंह का जन्म महामुनी विश्वामित्र की तपो भूमि बक्सर जिला के दुल्लहपुर ग्राम में स्व. श्री नरसिंह एवं लालमुनि देवी के गोद में सन 1937 में हुआ था।

आप चार अनुजों एवं दो अनुजा के अग्रज थे। आप चार पुत्रों एवं तीन पुत्रियों के पिता थे। आपके अव. पिता के वटवृक्ष जैसे फ़ैले परिवार में आपके जीवनकाल में ही पर सदस्यों का भरा-पूरा परिवार था। जिसके आप मुखिया थे। सबसे विशेष बात यह थी की आपके संरक्षण में ही परिवार के सभी सदस्य इस भिलाई नगरी में रहते थे। रिश्तेदारों की जो लम्बी श्रृंखला आपके द्वारा निर्मित की गई थी उन परिवारों के सदस्यों के गणण तीन सौ से अधिक थी। जो आपके जाने जे पश्चात अपने आप को अनाथ महसूस कर रहे हैं।

आप सन 1956 में भिलाई इस्पात संयंत्र के निर्माण काल में ही भिलाई आए थे। भोजपुरी क्षेत्र से आए प्रवासियों को संरक्षण प्रदान कर उनमें एकता और सहयोग का जो बीजारोपण आपके अपने जीवनकाल में किया था, वर्तमान में वह एक शक्ति का स्वरुप धारण कर इस नगर में अपनी अनूठी पहचान बना चुकी है और इस शक्ति का कर सामाजिक, धार्मिक एवं राजनैतिक रुप से इस नगर में आप आजीवन रहे। चाहे फ़िर वह सारनाथ ट्रेन को चलाने हेतु किया गया आंदोलन हो, अथ्वा बिहार - उत्तरप्रदेश की जनशक्ति एवं सामर्थ का प्रदर्शन करने हेतु रामायण मंडलियों का निर्माण को इन सभी गौरवशाली कार्यों के माध्यम से आपने जो व्यवस्था बनाई थी वह चिरस्मरणीय रहेगा।

आपका व्यक्तित्व इस नगर में एक अलग पहचान लिए हुआ था। आपके 6 फ़ीट की ल्म्बी काया उस पर पर्वत रुपी विशाल तनी छाती, ऐंठी मूंछ के उपर बंधी हुई आपकी पगडी महाराणा प्रताप के प्रतिबिम्ब सा लगता  था। आपका पहनावा धोती - कुर्ता जाकेट एवं पैरों में नागरा जुता आपकी विशेष छवि को और अधिक निखारता था।आपकी वह विशेषता भोजपुरी के जवानों का आजीवन प्रिनिधित्व करता रहा। आप राजनैतिक रुप से भाजपा से जुडे रहे और श्री प्रेम प्रकाश पाण्डेय आपदे प्रिय नेताओं में से थे।

सामाजिक रुप से क्षत्रिय कल्याण सभा के कर्मठ आजीवन सदस्य थे। क्षत्रिय कल्याण सभा के मुख्य द्वार का निर्माण कन आज भी आप अपनी उपस्थिति को महसूस कराते हैं। धार्मिक रुप से आप शिव एवं शक्ति के उपासक थे। सुपेला में बाबा बालकनाथ एवं अपने गांव में मां जगदम्बा की प्रतिमा स्थापित कर आप अमर हो गये।

आपकी जीवनकथा पर एक सम्पूर्ण महाकाव्य की रचना की जा सकती है। आपके द्वारा किए गए अमूल्य कार्यों का व्याख्यान क्षत्रिय समाज में आजीवन चर्चित रहेगा। संक्षेप में आपकी जीवनी का सार यह रहा कि 31 वर्षों तक भिलाई इस्पात संयंत्र को अपनी सेवा प्रदान करने पश्चात सन 1995 में आप अपने कार्यभार से सेवा मुक्त हुए और सन 2001 की वो काली रात 5 अक्टूबर को अपने भरे पूरे परिवार, रिश्तेदार, बन्धु बांधव एवं हजारों प्रशंसकों को रोता बिलखता छोडकर 64  वर्ष की उम्र में स्वर्ग सिधार गए।

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